सोमवार, 26 जुलाई 2010

भोजन का हक़ :एक अवलोकन

सभी राजनितिक पार्टिया चुनाव के समय अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा करती हैं की वे यदि सत्ता में आये तो गरीबो को रियायती मूल्य पर अनाज दिया जायेगा . वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद इस दिशा में कुछ कार्य अवश्य हुए . मगर सवाल उठता हैं की क्या ऐसी कोई योजना बनने के बाद क्या सभी गरीबो को अनाज मिल सकेगा . अव्यवस्थित राशन प्रणाली गरीबो तक अनाज पंहुचा सकेगी .यह असंभव सा लगता हैं. महात्मा गाँधी ने 1946 के नोआखाली सभा में कहा था की भूखे के लिए रोटी ही भगवान हैं .भजन का हक़ सभी मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार हैं .
संविधान का अनुच्छेद 21 गारंटी देता हैं की किसी व्यक्ति को विधि के द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा उसके जीवन या उसकी वैयाक्तितक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता हैं . 1948 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा में इसे भी समाहित किया गया. परन्तु कुछ समय पूर्व के घटनाक्रमों से से यह स्पष्ट हो जाता हैं की सभी के लिए भोजन का लक्ष्य दूर होता जा रहा हैं. एक आंकड़े के अनुसार 2006 -2008 के बिच खाधानो की कीमत 83 %बढ़ी जिसके परिणामस्वरूप भूख ,अल्पपोषण व राजनितिक अस्थिरता बढ़ी .
विकाशशील देशो में जहा परिवार की आय का 60 - 80 % हिस्सा भोजन पर खर्च किया जाता हैं. वहां खाधान की कीमतों में 20 %की वृद्धि करीब 10 करोड़ लोगो को B .P L की सूचि में शामिल कर देती हैं .भारत में अनाज की मांग साल दर साल बढ़ती जा रही हैं .जब की अखाधय फसल 5 -6 % की दर से बढ़ रही हैं. हमारे किसान अब ऊँची कीमत वाली फसलो की तरफ बढ़ रहे हैं क्यूँ की उन्हें वहा अधिक लाभ मिलता हैं .अतः स्वाभाविक हैं भुखमरी का बढ़ना.
पी डी एस में 36 % अनाज घपलेबाजी और 21 % उंच वर्गों तक चला जाता हैं ऍफ़ सी आई से गाड़ी खुलने के गाड़ी मरकत में चली जाती हैं . 11 राज्य और केंद्र शाशित प्रदेशो को छोड़ कर अनाजो की कालाबाजारी खूब हो रही हैं. उत्तर -पूर्वी राज्य की स्थिति तो काफी ख़राब हैं वहा तो एक भी दाना राशन प्रणाली के तहत नहीं बिकता हैं .गरीबो के इस अधिकार में संगठित गिरोह काम कर रहे हैं .फर्जीबाड़ा के इस धंधे को रोकने के लिए सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाये हैं .2 साल में 11 राज्य में 67 लाख राशन कार्ड को निरष्ट किया जा चुका हैं .
सरकार को सभी गांवो में बिजली ,सड़क की सुविधा जल्द से जल्द पहुचना चाहिये. बिचौलिओ को बर्दाशत नहीं करना चाहिये. भुखमरी पर सीधा हमला करने के लिए भोजन का अधिकार जरुरी हैं . सरकार को आधारभूत संरचनाओ को विकसित करना चाहिये जिसके बल पर गरीब स्वावलंबी बने और उन्हें किसी सरकारी सुविधा की जरुरत ही न पड़े. यह कृषि और ग्रामीण जीवन को व्यवस्थित कर संभव हो सकता हैं . हमारे नदिया जैसे गंगा-सतलज -ब्रहंपुत्र और कृष्णा -गोदावरी- कावेरी के डेल्टा भूमि में इतनी क्षमता हैं की वह सभी का पेट भर सकती हैं. परन्तु इसके लिए हमें विकाश की रणनीति के केंद्र में जल , जंगल ,जमीं व गांवो को रखना होगा .

पाकिस्तान : आतंकवादियो का गढ़

पाकिस्तान का जन्म हिंसा से भरे माहौल में हुआ. 1940 में मुस्लिम लीग ने प्रथम बार पाकिस्तान की मांग की. आज जैसा की हम सभी जानते हैं की पाकिस्तान आज बारूद के ढेर पर बैठा हुआ हैं .यह बारूद दुनिया के लिए खतरा हैं .आज पाकिस्तान में रोज बम धमाके, गोलीबारी हो रही हैं पाकिस्तान की हालत दिन पर दिन बिगडती जा रही हैं . तह बिगड़ती हालत संपूर्ण विश्व खासकर भारत के लिए चिंता का विषय हैं. सभी आतंकी घटनाये चाहे वह भारत में घटित हो या अमेरिका में घटित हो सभी के तार पाकिस्तान से जुड़े होते हैं. आज पाकिस्तान आतंक रुपी कैंसर से खुद तबाह हैं.
पाकिस्तानी हुक्मरान लगातार यह अफवाह फैलाते हैं की भारत से उसके अस्तित्व को खतरा हैं. पाकिस्तान में भारत विरोधी गतिविधिया बे रोक टोक जरी हैं . पाकिस्तान में भारत के विरोध करने का फैसन चल पड़ा हैं. पाकिस्तान में लोगो का मानना हैं की उसका सबसे बड़ा दुश्मन भारत हैं. जब की भारत कभी भी पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों में शामिल ही नहीं रहा हैं . पाकिस्तान बेवजह का आरोप लगता हैं कि भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी का हाथ पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों में हैं. जब की सच तो यह हैं की पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी I .S .I . का हाथ भारत विरोधी गतिविधियों में हैं. यह कितनी बार प्रमाणित भी हो चुका हैं और इसे संपूर्ण विश्व भी जानता हैं.
पाकिस्तान की बिगड़ती हालत भारत के लिए चिंताजनक हैं. पाकिस्तान आज असफल राष्ट्र बन चुका हैं . वहा कब कहाँ क्या हो जाये कहा नहीं जा सकता हैं? पाकिस्तान की हालत जितनी ख़राब होगी भारत के लिए परेशानी उतनी ही बढ़ेगी . आतंकी संगठन पाकिस्तान में अपनी स्थिति मजबूत कर बुद्धजीवी वर्ग को सत्ता से हटाकर खुद बैठ जायेंगे और इस प्रकार पाकिस्तान आतंकवादियो का देश कहलाने लगेगा . बुद्धजीवी वर्ग से तो बातचीत हो सकती हैं लेकिन आतंकवादियो से नहीं क्यूँ की वे सिर्फ गोली की भाषा समझते हैं. भारत के लगभग सभी आतंकी घटनाओ का तार पाकिस्तान से जुदा रहता हैं . ताज़ा घटनाक्रम पर नजर डाले तो 2008 -26 NOV 2009 अत्यधिक आतंकी घटनाये हुए . 26 NOV 2009 को घटित घटना जो एक प्रकार का अघोषित युद्ध था जिसे हमारे जाबांज और बहादुर अधिकारिओ और सैनिको ने तीन दिन तक लड़ा .यदि पाकिस्तान की हालत इसी तरह बिगड़ती रही तो संभवतः परमाणु हथियार आतंकियों के हाथ में चला जायेगा. जिसके और संपूर्ण विश्व के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो जायेगा. यह मान लेना उचित नहीं होगा की पाकिस्तान के परमाणु हथियार सुरक्षित हैं आज पाकिस्तान और पाक अधिकित कश्मीर (P .O .K )में सैकड़ो की संख्या में आतंकी प्रशिक्षण शिविर बेरोकटोक चल रहे हैं जो भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं.
पाकिस्तान में सरकार को बातचीत में सेना को भी शामिल करनी चाहिए क्यूँ की वहा बिना सेना की बातचीत महत्वहीन हैं . पाक में वही होता हैं जो वहां की सेना चाहती हैं .I .S . I . भारत में जाली नोटों को खफा रही हैं . सरकार को सीमा पर सख्त निगरानी करनी चाहिए. नेपाल की खुली सीमा पर सख्त निगरानी होनी चाहिए . खासकर समुंद्री सीमाओ पर कड़ी निगरानी करनी चाहिए. क्यूँ की इसी के रास्ते पाकिस्तान प्रशिक्षित पाकिस्तानी आंतंकवादी भारत में आकर भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में तीन दिनों का एक अघोषित युद्ध लड़ा था. मुंबई हमले के जिन्दा बचे आतंकवादी कसाब को भारत की अदालत ने फांसी की सजा दी लेकिन फांसी होगी या नहीं यह कहना जड़ा मुस्किल लगता हैं .क्यूँ की अभी उसके आगे फांसी पाने वाले लोगों की लम्बी फेहरिस्त हैं. संसद हमले का आरोपी अफज़ल गुरु भी अभी मौत का इंतज़ार कर रहा हैं. अब यह देखना हैं की इन देश के दुश्मनो को कब तक मौत अपनी गले लगाती हैं.लेकिन सवाल उठता हैं की क्या अफज़ल को फांसी देने से भारत में आतंकी घटने रुक जाएगी ? मेरा मतलब यह नहीं हैं की अफज़ल को फांसी नहीं हो . उसने अक्षम्य अपराध किया हैं और सजा निश्चित तौर पर मिलनी चाहिए .लेकिन जिन्होंने इस घटना की साजिश रची उनका क्या होगा ? पाकिस्तान से इस मामले में मदद मांगना बेबकूफी होगी .
इन घटनाओ से निपटने के लिए हमें हमेशा सतर्क रहना होगा .चाणक्य निति में भी कहा गया हैं की अगर सुखी और शांति से जीना चाहते हो तो हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहो. सरकार को सेनाओ की आधुनिकीकरण पर ध्यान देना चाहिये.

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

जलवायु परिवर्तन :विश्व के समक्ष बढ़ता संकट

आज संपूर्ण विश्व में वैश्विक तपन एक प्रमुख समस्या बनकर उभरी हैं. ग्लोबल वार्मिंग मानव के द्वारा जन समस्या हैं न की प्रकृति के द्वारा. ग्लोबल वार्मिंग के लिए हम मनुष्य खुद जिम्मेदार हैं ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु में आये परिवर्तन ने पृथ्वी के जीवधारियो और वनस्पति जगत के समक्ष उनके अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया हैं .कही असामान्य वर्ष हो रही हैं ,कही असमय ओले पड़ रहे हैं, कही गलेशियर पिघलते जा रहे हैंतो कही रेगिस्तान पसरते जा रहे हैं. वैश्विक तपन के कारण दुनिया के तटवर्ती द्वीप जैसे पापुपा न्यू गिनी, मौरीसस आदि के अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया हैं . पापुआ न्यू गिनी का तो अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर हैं. वहा से लोग जीवन की तलाश में दुसरे जगह जा रहे हैं . आस्ट्रेलिया में हुए एक शोध के अनुसार वैश्विक तपन के कारण इन द्वीपों के समुंद्री जलस्तर में 8 .2 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हो रही हैं. इससे स्पष्ट हैं की आने वाले समय में स्थिति गंभीर होने वाली हैं . भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण का भी प्रावधान हैं . 42 संविधान संशोधन के द्वारा 1976 में 48 ए और 51 ए (जी ) जोड़ा गया. जिसके अनुसार प्रयावरण संरक्षण का दायित्व राज्य के सरकार और उसके नागरिको पर डाला गया . स्टोक होम में 1972 में हुए संयुक्त राष्ट्र मंविये सम्मलेन में पर्यावरण के क्षेत्र में अनेक कानूनों के निर्माण को दोष प्रदान किया गया. जल अधिनियम , वायु अधिनियम , पर्यावरण से जुडी प्रावधानों को संविधान में शामिल किया गया. भोपाल में हुए 1984 के गैस त्रासदी में भारतीय वैधानिक प्रणाली की खामिया सामने आई .ऐसी त्रासदी से निपटने की लिए सरकार ने 1984 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बनाया हैं. वैश्विक तपन के मुख्य कारण मनुष्य की विष्फोटक जनसँख्या हैं और उसके अनियंत्रित ,तथाकथित विकाश की बढ़ती उर्जा जरूरतों को पूरा करने हेतु जलाये जाने वाले जीवाश्म इंधन जैसे पेट्रोलियम ,कोयला आदि से निकलने वाली कार्बन डाइ ऑक्साइड ,व अन्य ग्रीन हॉउस गैसे जैसे मीथेन, नाइट्रस ऑक्सा ईंड और सी ऍफ़ सी हैं. पृथ्वी के वातावरण में आज ग्रीन हॉउस गैसों की सांद्रता बहुत उच्च स्तर तक पहुँच चुकी हैं. जिससे धरातल से परावर्तित होने वाली ऊष्मा इन गैसों के कारण वायुमंडल में फंस जाती हैं .और पुरे विश्व का तापमान बढ़ा देती हैं.कार्बन डाइ औक्सआइडऔर क्लोरो फ्लोरो कार्बन मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं . वैश्विक तपन के कारण भारत जैसे अत्यधिक जनसंख्या वाले देशो दूरगामीप्रभाव परने की संभावना हैं. हिमालय की हमखंड के पिघलने और उपलब्ध जल से ज्यादा वाष्प के उत्सर्जन से उत्तर - दक्षिण भारत में पानी की भरी किल्लत हो सकती हैं. जिसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा और हमारे समक्ष खाद्य संकट पैदा हो जायेगा. यह संकट आने के पहले ही हमें ग्लाबल वार्मिंग से निपटने हेतु व्यापक स्तर पर अभी से ही तैयारी शुरू करने की जरुरत हैं. जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से विकसित देश ही जिम्मेदार हैं . दुनिया में सबसे अधिक कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन अमेरिका करता हैं. कार्बन उत्सर्जन की परिणामस्वरूप हिमालय हिल गया हैं .इससे गंगा के अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया हैं . भारत में हिमालय और कृषि की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका हैं और यह सभी कार्बन उत्सर्जन से अधिक प्रभावित हैं. अतः भारत को कार्बन उत्सर्जन के मामले में बहुत ही सावधान रहना चाहिये. आज कल विकसित देश एक नए फंडे का उपयोग कर रहे हैं . वे अपने देश में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्र को कम न कर अपना धन विकाशशील देशो में लगा रहे हैं वहां कार्बन डाइ ऑक्साइड में हो रही कटौती का श्रेय खुद ले रहे हैं . इस तरह वे बिना कटौती किये ही इसका श्रेय ले रहे हैं. ग्लोबल वार्मिंग को रोकने हेतु उपाय. 1 .ज्यादा- ज्यादा वृक्ष लगाने चाहिये.2 फ्रिज, ए .सी., और अन्य कुलिंग मशीनों का प्रयोग कम से कम करना चाहिये.3 . पवन और सौर उर्जा के द्वारा बिजली उत्पन किया जाना चाहिये.4 .शैक्षिक पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से इसे शामिल किया जाना चाहिये .5 .जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगनी चाहिये.6 .जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामो के बारे में प्रचार- प्रसार कर जागरूकता अभियान चलाना चाहिये. 7 . बिज़ली का कम से कम प्रयोग करना चाहिये .काम खत्म होने के बाद कंप्यूटर, ए .सी. ,टी. वी.आदि बंद करना चाहिये. जलवायु परिवर्तन से देश का चतुर्दिक विकाश रुक सकता हैं.अतः ऐसे सरे उपाए किये जाने चाहिये जिनसे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित किया जा सके.

बाल श्रम: बर्बाद होता बचपन

यह एक शर्मनाक सच्चाई हैं कि विश्व में सर्वाधिक बाल श्रमिक भारत में हैं .सरकारी आंकड़ो पर यदि गौर करे तो बाल श्रमिको की संख्या लगभग 2 करोड़ हैं परन्तु निजी स्रोतों पर गौर करे तो यह लगभग 11 करोड़ से अधिक हैं .सरकारी व निजी दोनों आंकड़ो में जमीन आसमान का अंतर हैं .स्पष्ट हैं की भारत में कितने बाल श्रमिक हैं यह स्पष्ट रूप से मालूम नहीं हैं .दोनों के आंकड़ो मेंविरोधाभास हैं . गरीब तबको में परिवार नियाजन के प्रति अरुचि के कारण बाल मजदूर की संख्या तेजी से बढ़ी हैं इसमे कोई दो राय नहीं की बाल श्रमिक का मूल कारण गरीबी ही हैं . माना की किसी गरीब के पास चार बच्चे हैं अगर वे चारो 1000 1000 रूपये के महीने कमाते हैं तो गरीब व्यक्ति के पड़ 4000 हज़ार रूपये होते हैं . वह व्यक्ति सोचता हैं की अगर मै इसे पढ़ता तो मुझे पैसे खर्च करने पड़ते लेकिन जब मेरे बच्चे मुझे काम कर मुझे नियत वेतन देते हैं तो बच्चो को पढ़ने से क्या फायदा? .वह व्यक्ति ऐसा इसलिए सोचता हैं क्यूँ की वह अशिक्षित होने के साथ -साथ गरीब हैं .उसे शिक्षा के महत्व के बारे में पता नहीं हैं. विधान की धारा 24 कहता हैं की 14 वर्ष से काम उम्र के बच्चो को कारखाना ,अथवा खान या किसी ऐसे काम में नही लगाया जायेगा जो जोखिम भरा हो .संविधान की धारा 39 में बच्चो की शोषण और दमन के विरुद्ध संरक्षण की व्यवस्था दी गई हैं .इसके अलावा 1951 में बागन श्रमिक अधिनियम बनाया गया जिसके अनुसार चाय, कॉफ़ी के बागानों में 12 वर्ष से काम उम्र के बच्चो को इस काम में नहीं लगाया जा सकता हैं .इसके एक साल बाद 1952 में खाधान में काम करने के लिए डाक्टरी प्रमाण पत्र आवश्यक किया गया .1961 में मोटर परिवहन श्रमिक अधिनियम बनाया गया जिसके अनुसार 15 वर्ष से काम उम्र के बच्चों को किसी भी मोटर परिवहन अंडरटेकिंग में किसी भी रूप में काम करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. 1966 में बीडी औरे सिगरेट अधिनियम बनाया गया तथा राज्य में व्यापारिक प्रतिष्ठानों अधिनियम द्वारा बच्चो के कल्याण से जुड़े कानून बनाये गए. 1986 में बाल श्रमिक अधिनियम पारित किया गया जिसके अनुसार 14 वर्ष से काम उम्र के बच्चो को किसी भी औधोगिक प्रतिष्ठानों में काम करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया .1987 में राष्ट्रीय बाल श्रम नीति बनाई गई. जिसमे उनकी शिक्षा , मनोरंजन ,सामान्य विकास के कार्यक्रमों पर बल दिया गया. भारत के संविधान और कानून ने बच्चो को हर जगह सुरक्षा प्रदान किया हैं .परन्तु राजनैतिक और सामाजिक इच्छा शक्ति नहीं होने के कारण इसे लागू करने में परेशानिया आती हैं सरकार को चाहिए की .कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करे और उनके पुनर्वास पर भी ध्यान दे .क्योंकि बचपन कभी नहीं लौटता .अतः बच्चो के उत्थान के लिए एक इमानदार प्रयास करने की जरुरत हैं . सिर्फ हर साल 12 जून को धूमधाम से बाल श्रमिक दिवस मनाने से कुछ होने वाला नहीं हैं .

बाल श्रम: बर्बाद होता बचपन

यह एक शर्मनाक सच्चाई हैं कि विश्व में सर्वाधिक बाल श्रमिक भारत में हैं .सरकारी आंकड़ो पर यदि गौर करे तो बाल श्रमिको की संख्या लगभग 2 करोड़ हैं परन्तु निजी स्रोतों पर गौर करे तो यह लगभग 11 करोड़ से अधिक हैं .सरकारी व निजी दोनों आंकड़ो में जमीन आसमान का अंतर हैं .स्पष्ट हैं की भारत में कितने बाल श्रमिक हैं यह स्पष्ट रूप से मालूम नहीं हैं .दोनों के आंकड़ो मेंविरोधाभास हैं . गरीब तबको में परिवार नियाजन के प्रति अरुचि के कारण बाल मजदूर की संख्या तेजी से बढ़ी हैं इसमे कोई दो राय नहीं की बाल श्रमिक का मूल कारण गरीबी ही हैं . माना की किसी गरीब के पास चार बच्चे हैं अगर वे चारो 1000 1000 रूपये के महीने कमाते हैं तो गरीब व्यक्ति के पड़ 4000 हज़ार रूपये होते हैं . वह व्यक्ति सोचता हैं की अगर मै इसे पढ़ता तो मुझे पैसे खर्च करने पड़ते लेकिन जब मेरे बच्चे मुझे काम कर मुझे नियत वेतन देते हैं तो बच्चो को पढ़ने से क्या फायदा? .वह व्यक्ति ऐसा इसलिए सोचता हैं क्यूँ की वह अशिक्षित होने के साथ -साथ गरीब हैं .उसे शिक्षा के महत्व के बारे में पता नहीं हैं. विधान की धारा 24 कहता हैं की 14 वर्ष से काम उम्र के बच्चो को कारखाना ,अथवा खान या किसी ऐसे काम में नही लगाया जायेगा जो जोखिम भरा हो .संविधान की धारा 39 में बच्चो की शोषण और दमन के विरुद्ध संरक्षण की व्यवस्था दी गई हैं .इसके अलावा 1951 में बागन श्रमिक अधिनियम बनाया गया जिसके अनुसार चाय, कॉफ़ी के बागानों में 12 वर्ष से काम उम्र के बच्चो को इस काम में नहीं लगाया जा सकता हैं .इसके एक साल बाद 1952 में खाधान में काम करने के लिए डाक्टरी प्रमाण पत्र आवश्यक किया गया .1961 में मोटर परिवहन श्रमिक अधिनियम बनाया गया जिसके अनुसार 15 वर्ष से काम उम्र के बच्चों को किसी भी मोटर परिवहन अंडरटेकिंग में किसी भी रूप में काम करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. 1966 में बीडी औरे सिगरेट अधिनियम बनाया गया तथा राज्य में व्यापारिक प्रतिष्ठानों अधिनियम द्वारा बच्चो के कल्याण से जुड़े कानून बनाये गए. 1986 में बाल श्रमिक अधिनियम पारित किया गया जिसके अनुसार 14 वर्ष से काम उम्र के बच्चो को किसी भी औधोगिक प्रतिष्ठानों में काम करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया .1987 में राष्ट्रीय बाल श्रम नीति बनाई गई. जिसमे उनकी शिक्षा , मनोरंजन ,सामान्य विकास के कार्यक्रमों पर बल दिया गया. भारत के संविधान और कानून ने बच्चो को हर जगह सुरक्षा प्रदान किया हैं .परन्तु राजनैतिक और सामाजिक इच्छा शक्ति नहीं होने के कारण इसे लागू करने में परेशानिया आती हैं सरकार को चाहिए की .कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करे और उनके पुनर्वास पर भी ध्यान दे .क्योंकि बचपन कभी नहीं लौटता .अतः बच्चो के उत्थान के लिए एक इमानदार प्रयास करने की जरुरत हैं . सिर्फ हर साल 12 जून को धूमधाम से बाल श्रमिक दिवस मनाने से कुछ होने वाला नहीं हैं .

सोमवार, 12 जुलाई 2010

खतरे में गंगा

भारत नदियो का देश रहा हैं . जहा गंगा , यमुना, सरस्वती ,गंडक , घाघरा ,कोशी , दामोदर ,गोदावरी जैसी पवित्र नदिया बहती हैं . इन नदियो में गंगा का स्थान अद्वितीय हैं . गंगा सिर्फ एक नदी ही नहीं हैं वरन यह भारत के करोडो लोगो की आस्था की प्रतीक भी रही हैं .इसके अलावा धार्मिक ग्रंथो में भी इसकी चर्चा रही हैं .गंगा को पुण्य ललिता .पतित पावनी न जाने कितने नामो से जाना जाता हैं. गंगा मैदानी क्षेत्रो में सबसे पहले हरिद्वार को स्पर्श करती हैं. गंगा बिहार , उत्तर- प्रदेश , तथा पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती हैं .इस राज्यों की लाखो हेक्टेयर की जमीन की सिचाई गंगा नदी के भरोशे होता हैं . लेकिन दुःख की बात यह हैं की भारत की गंगा माँ आज अपनी अस्तित्व बचने की लड़ाई लड़ रही हैं. वैज्ञानिको के अनुसार गंगा का प्रदूषित होना उसके उदगम स्थान से ही शुरू हो जाती हैं. पर्यटक ,तीर्थ यात्रा से होने वाली गंदगी से गंगा दूषित हो रही हैं. बड़ी -बड़ी कारखानों ,कंपनियो, अस्पतालों से निकलने वाली दूषित पदार्थो से हमारी पवित्र नदी दूषित हो रही हैं.धर्मशालाओ ,अतिथिगृहो,,होटलों आदि के मल- मूत्र सब गंगा में ही गिराए जा रहे हैं. जिसके कारण इसका जल दूषित होता जा रहा हैं .हरिद्वार स्थित भारत हेवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड के वैज्ञानिको के अनुसार आज गंगा का जल न पीने लायक और न नहाने के लायक भी नहीं बचा हैं. हरिद्वार में स्थित कंपनिया ,अस्पताल ,होटल आदि अपने यहाँ की सारा का सारा कचरा गंगा में बहा देते हैं . गंगा निकलती तो हैं साफ और स्वच्छ परन्तु सबसे पहले वह हरिद्वार आती हैं और हरिदर से ही वह पूरी तरह से दूषित हो जाती हैं .हरिद्वार की दावा कंपनिया खतरनाक रसायन जैसे एसीटोन, हाईड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देते हैं जिसे इस पवित्र नदी का जल दूषित हो गया हैं. इस नदी को बचाने लिए पर्यावरण जाग्रति को एक रचनात्मक आन्दोलन का रूप प्रदान करना होगा. उधोगो को लगाने के पहले प्रदुषण रोकने सम्बन्धी नीति को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. किसी भी प्रकार की कारखानों को प्रदुषण फ़ैलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इसके बावजूद भी अगर नदी को प्रदूषित किया जाय तो प्रदुषण फ़ैलाने वाले के खिलाफ कठोर से कठोर सजा का प्रावधान किया जाय. केन्द्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार गंगा नदी में ऑक्सीजन की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही हैं .बोर्ड के अनुसार नदी में कौलिफोर्म बैक्टीरिया की संख्या लगातार खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं. सरकार ने गंगा की देख -रेख के लिए एक समिति का गठन किया हैं जो एक स्वागत योग्य कदम हैं. सरकार को जागरूकता अभियान पर विशेष ध्यान देना चाहिए. मध्यम वर्ग के लोग मुक्ति के नाम पर बहुत सारी दूषित चीजे गंगा नदी में डाल देते हैं जिसके परिणामस्वरूप इसका जल दूषित होता जा रहा हैं. अतः जल्द से जल्द गंगा को दूषित होने से बचाने के लिए समय रहते उपर्युक्त कदम उठाने होंगे.

खतरे में गंगा

भारत नदियो का देश रहा हैं . जहा गंगा , यमुना, सरस्वती ,गंडक , घाघरा ,कोशी , दामोदर ,गोदावरी जैसी पवित्र नदिया बहती हैं . इन नदियो में गंगा का स्थान अद्वितीय हैं . गंगा सिर्फ एक नदी ही नहीं हैं वरन यह भारत के करोडो लोगो की आस्था की प्रतीक भी रही हैं .इसके अलावा धार्मिक ग्रंथो में भी इसकी चर्चा रही हैं .गंगा को पुण्य ललिता .पतित पावनी न जाने कितने नामो से जाना जाता हैं. गंगा मैदानी क्षेत्रो में सबसे पहले हरिद्वार को स्पर्श करती हैं. गंगा बिहार , उत्तर- प्रदेश , तथा पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती हैं .इस राज्यों की लाखो हेक्टेयर की जमीन की सिचाई गंगा नदी के भरोशे होता हैं . लेकिन दुःख की बात यह हैं की भारत की गंगा माँ आज अपनी अस्तित्व बचने की लड़ाई लड़ रही हैं. वैज्ञानिको के अनुसार गंगा का प्रदूषित होना उसके उदगम स्थान से ही शुरू हो जाती हैं. पर्यटक ,तीर्थ यात्रा से होने वाली गंदगी से गंगा दूषित हो रही हैं. बड़ी -बड़ी कारखानों ,कंपनियो, अस्पतालों से निकलने वाली दूषित पदार्थो से हमारी पवित्र नदी दूषित हो रही हैं.धर्मशालाओ ,अतिथिगृहो,,होटलों आदि के मल- मूत्र सब गंगा में ही गिराए जा रहे हैं. जिसके कारण इसका जल दूषित होता जा रहा हैं .हरिद्वार स्थित भारत हेवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड के वैज्ञानिको के अनुसार आज गंगा का जल न पीने लायक और न नहाने के लायक भी नहीं बचा हैं. हरिद्वार में स्थित कंपनिया ,अस्पताल ,होटल आदि अपने यहाँ की सारा का सारा कचरा गंगा में बहा देते हैं . गंगा निकलती तो हैं साफ और स्वच्छ परन्तु सबसे पहले वह हरिद्वार आती हैं और हरिदर से ही वह पूरी तरह से दूषित हो जाती हैं .हरिद्वार की दावा कंपनिया खतरनाक रसायन जैसे एसीटोन, हाईड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देते हैं जिसे इस पवित्र नदी का जल दूषित हो गया हैं. इस नदी को बचाने लिए पर्यावरण जाग्रति को एक रचनात्मक आन्दोलन का रूप प्रदान करना होगा. उधोगो को लगाने के पहले प्रदुषण रोकने सम्बन्धी नीति को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. किसी भी प्रकार की कारखानों को प्रदुषण फ़ैलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इसके बावजूद भी अगर नदी को प्रदूषित किया जाय तो प्रदुषण फ़ैलाने वाले के खिलाफ कठोर से कठोर सजा का प्रावधान किया जाय. केन्द्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार गंगा नदी में ऑक्सीजन की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही हैं .बोर्ड के अनुसार नदी में कौलिफोर्म बैक्टीरिया की संख्या लगातार खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं. सरकार ने गंगा की देख -रेख के लिए एक समिति का गठन किया हैं जो एक स्वागत योग्य कदम हैं. सरकार को जागरूकता अभियान पर विशेष ध्यान देना चाहिए. मध्यम वर्ग के लोग मुक्ति के नाम पर बहुत सारी दूषित चीजे गंगा नदी में डाल देते हैं जिसके परिणामस्वरूप इसका जल दूषित होता जा रहा हैं. अतः जल्द से जल्द गंगा को दूषित होने से बचाने के लिए समय रहते उपर्युक्त कदम उठाने होंगे.